घोघड़, चम्बा, 14 अप्रैल : भारतीय कलेंडर में 14 अप्रैल की तिथि वैशाखी पर्व के लिए जानी जाती है परंतु हिमाचल प्रदेश के गद्दी समुदाय इस दिन को बसोआ त्योहार के रूप में मनाता है। समुदाय में बसोआ त्योहार का विशेष महत्व है। यह त्योहार ऋतु के बदलाव, अपनो से दोबारा मिलने, कृषि कार्य प्रारम्भ करने के साथ-साथ देवी-देवताओं की शरण में जाने के लिए मनाया जाता है।

क्षेत्र के वरिष्ठ नागरिक नानकू राम, प्रीतम चंद, टोला राम बताते हैं कि गद्दी समुदाय के रीति-रिवाज, धार्मिक अनुष्ठानों की अपनी विधियां है जोकि वैदिक विधियों से अलग हैं । वे बताते हैं कि तीन दशक पूर्व दूर संचार व यातायात की सुविधा न थी । क्षेत्र के लोग शीतकालीन प्रवास पर हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा, हमीरपुर, ऊना जिला की ओर निकल जाते थे । पीछे छूट गए उनके पारिवारिक सदस्यों से इस छः माह की अवधि में किसी प्रकार कोई सम्पर्क नहीं हो पाता था। भरमौर क्षेत्र से निचले नवम्बर माह में अपेक्षाकृत गर्म भागों में प्रवास करने वाले घुमंतु गद्दी अप्रैल माह में लौटते थे । लौटकर वे अपने कुलदेवी व कुल देवता के मंदिरों में पूजा-अर्चना हेतु पहुंचते हैं। आज संचार व यातायात साधन सम्पन्नता होने के कारण लोग चंद घंटों में ‘जांधर से गद्देरन’ पहुंच जाते हैं परंतु परम्पराओं का निर्वहन पूर्ववत जारी है।

वरिष्ठ नागरिकों का कहना है कि गद्दी समुदाय शीतकाल में मंदिरों में पूजा नहीं करता था जिसके पीछे तर्क है कि इस दौरान देवी-देवता ध्यान, विश्राम या असुरों से युद्ध में व्यस्त होते हैं। ऐसे में मंदिरों में जाने से उनका ध्यान भंग हो जाता है। देवी देवताओं के मुख्य मंदिर अक्सर गांव से दूर व एकांत स्थान पर होते हैं और इस पूरे क्षेत्र को ‘अंदरोळ’ (देव आवास क्षेत्र) कहकर पुकारा जाता है ।
इन अंदरोळों में देव मर्यादा पालन के कठोर नियम हैं जिनमें निर्धारित विशेष समय सीमा में किसी का भी दखल वर्जित है। अंदरोल खुलने के उपरांत भी वहां घूमने, रहने, भोजन से शौच प्रक्रिया तक के कठोर नियम हैं। यह नियम प्रकृति से छेड़-छाड़ किए बिना आदिवासी जीवन यापन के लिए बनाए गए हैं। मान्यता है कि अगर कोई इन नियमों की अवहेलना करता है तो उसे परिवार सहित देवताओं का कोपभाजन झेलना पड़ता है।

शीतकाल में पूरा क्षेत्र बर्फ से ढक जाता है और एक प्रकार से पर्यावरण, पृथ्वी, वनस्पति व जीव जन्तु इस अवधि में स्वयं को नए जीवन चक्र के लिए तैयार करते हैं। चूंकि 14 अप्रैल से हिन्दू पचांग के अनुसार वैसाख माह आरम्भ होता है और बर्फीले क्षेत्रों से बर्फ पिघलने लगती है। माना जाता है कि इसी दिन देवी-देवता क्षेत्र में स्थित अपने मंदिरों में पुनः विराजमान होते हैं। इस लिए गद्दी समुदाय के लोग बसोआ वाले दिन से ही मंदिरों में पूजा अर्चना आरम्भ करते हैं।

बसोआ पर्व के अवसर पर आज भरमौर क्षेत्र के प्रसिद्ध मंदिर भरमाणी, कार्तिक मंदिर कुगती, जलधार मंदिर खुंड में श्रद्धालुओं ने पूजा-अर्चना की। भरमाणी माता मंदिर में आज गद्दी समुदाय ने ऐंचली गायन पर देवी का आह्वान किया। लोगों ने इस अवसर मंदिर प्रांगण में लोक नृत्य प्रस्तुत किए।
कार्तिक मंदिर में 135 दिन पूर्व मंदिर द्वार बंद करते समय रखे कलश में रखे जल का स्तर गत वर्ष से अधिक रहा। कलश में रखे जल का स्तर मात्र चार इंच नीचे गया था। मान्यता अनुसार यह इस बात का संकेत है कि इस वर्ष भी मौसम कृषि के अनुकूल रहेगा। वर्षा अपेक्षाकृत अधिक होगी।
क्षेत्र के लोग आज से अपने खेतों में खरीफ फसलों की बुआई की तैयारियां प्रारम्भ करेंगे।
