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घोघड़, नई दिल्ली 17 मार्च : भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर के महत्व को समझने और इसके संरक्षण की जिम्मेदारी निभाने की प्रेरणा देता है। भारत, प्राचीन काल से लेकर औपनिवेशिक युग तक के ऐतिहासिक स्मारकों और पुरावशेषों का विशाल भंडार है। हालांकि, इनका समुचित दस्तावेजीकरण और संरक्षण अभी भी एक चुनौती बना हुआ है। इसी दिशा में सरकार ने स्मारकों और पुरावशेषों के डिजिटलीकरण के लिए ‘राष्ट्रीय स्मारक और पुरावशेष मिशन’ (एनएमएमए) की शुरुआत की है।

एनएमएमए की स्थापना 2007 में की गई थी, जिसका उद्देश्य भारत के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों को डिजिटल रूप में संरक्षित करना है। इस मिशन के तहत राष्ट्रीय स्तर पर एकीकृत डेटाबेस तैयार किया जा रहा है, जिससे अनुसंधान और संरक्षण में सहायता मिलेगी।

एनएमएमए की उपलब्धियां:

  • पुरावशेषों का डिजिटलीकरण: अब तक 12,34,937 पुरावशेषों को डिजिटल स्वरूप में संरक्षित किया गया है।
  • निर्मित धरोहर और स्थल: 11,406 स्मारकों और स्थलों का दस्तावेजीकरण पूरा किया गया है।
  • बजट आवंटन: वित्त वर्ष 2024-25 के लिए इस योजना के तहत 20 लाख रुपये आवंटित किए गए हैं।

एनएमएमए के प्रमुख उद्देश्य:

  • राष्ट्रीय स्तर पर सांस्कृतिक धरोहरों का डेटाबेस तैयार करना।
  • राज्य, निजी संस्थानों और विश्वविद्यालयों में संग्रहित पुरावशेषों का एकसमान दस्तावेजीकरण सुनिश्चित करना।
  • सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण के प्रति जागरूकता बढ़ाना।
  • संग्रहालयों, विश्वविद्यालयों और अन्य संगठनों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रमों का आयोजन करना।

आधुनिक डिजिटल तकनीकें, जैसे 3डी स्कैनिंग, वर्चुअल रियलिटी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, विरासत संरक्षण के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव ला रही हैं। इन तकनीकों के माध्यम से:

  • प्राचीन पांडुलिपियों, मूर्तियों और स्मारकों को उच्च-रिज़ॉल्यूशन में डिजिटलीकरण किया जा सकता है।
  • लुप्तप्राय या क्षतिग्रस्त ऐतिहासिक संरचनाओं का वर्चुअल पुनर्निर्माण किया जा सकता है।
  • डिजिटल संग्रहालयों के माध्यम से आम जनता और शोधकर्ताओं को सांस्कृतिक धरोहरों तक ऑनलाइन पहुँच उपलब्ध कराई जा सकती है।

भारत की सांस्कृतिक विरासत का डिजिटलीकरण इसकी सुरक्षा और संरक्षण के लिए एक आवश्यक कदम है। एनएमएमए इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है, जिससे न केवल ऐतिहासिक धरोहरों को संरक्षित किया जा सके, बल्कि आगामी पीढ़ियों के लिए भी इन्हें सुलभ बनाया जा सके। डिजिटल प्रौद्योगिकी के सहयोग से, भारत की समृद्ध सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित रखते हुए इसे वैश्विक स्तर पर प्रदर्शित करने का मार्ग प्रशस्त हो रहा है।


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