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घोघड़, चम्बा/हिमाचल प्रदेश, 04 मई : हिमाचल प्रदेश में होने जा रहे पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों के नामांकन अभी आरम्भ नहीं हुए हैं परंतु प्रधान, उप प्रधान, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद यहां तक कि पंचायत के वार्ड सदस्य पदों की दावेदारी के लिए सोशल मीडिया के माध्यम से चुनाव प्रचार आरम्भ हो चुका है। प्रत्याशी तरह-तरह को आकर्षक पोस्टर बनाकर सोशल मीडिया में डालकर मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने प्रयास कर रहे हैं।

इस बीच एक अहम सामाजिक और राजनीतिक सवाल तेजी से उभर रहा है। कई महिला प्रत्याशियों के चुनाव प्रचार पोस्टरों में उनके स्वयं के बजाय उनके पति या अन्य रिश्तेदारों की तस्वीरें और नाम प्रमुखता से दर्शाए जा रहे हैं। यह मानसिकता न केवल महिला नेतृत्व की स्वतंत्र पहचान पर प्रश्नचिह्न लगाती है, बल्कि जमीनी स्तर पर महिला सशक्तिकरण की वास्तविक स्थिति को भी उजागर करती है।

ग्रामीण क्षेत्रों में देखे जा रहे इन पोस्टरों में अक्सर महिला उम्मीदवार के साथ “फलां की पत्नी” या “फलां परिवार की बहू” जैसे परिचय को प्रमुखता दी जाती है। कई मामलों में तो पोस्टर में पति या परिवार के अन्य पुरुष सदस्य की तस्वीर महिला उम्मीदवार से अधिक प्रमुख स्थान पर होती है। इस प्रकार के चुनाव प्रचार से साफ संकेत मिलता है कि चुनावी मैदान में उतरने वाली महिला की पहचान और प्रभाव उसके अपने विचारों या कार्यों से नहीं, बल्कि उसके पुरुष रिश्तेदारों से जुड़ा हुआ है। और सीधा सा अर्थ है कि चुनाव जीतने के बाद महिला प्रतिनिधि के निर्णय उनके पति या अन्य रिश्तेदारों के प्रभाव और निगरानी में होंगे।

सामाजिक सरोकार व  राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि पंचायती राज व्यवस्था में महिलाओं के लिए आरक्षण का उद्देश्य उन्हें निर्णय प्रक्रिया में सक्रिय और स्वतंत्र भागीदारी देना था। लेकिन यदि चुनाव प्रचार ही इस प्रकार का संदेश दे रहा है कि असली निर्णय लेने वाला कोई और है, तो यह आरक्षण की मूल भावना के साथ न्याय नहीं करता।

चुनाव मैदान में उतरने से पहले उन महिला प्रत्याशियों को पहले यह समझना होगा कि चुनाव लड़ने का निर्णय उनका अपना है या पारिवारिक सदस्यों का? अगर वे कठपुतली बनकर रह गईं तो वे यह भी जान लें कि लोग जन प्रतिनिधियों के निर्णय व योजनाओं के पीछे की मंशा को आसानी से भांप लेते हैं। 

स्थानीय लोगों के बीच भी इस मुद्दे को लेकर चर्चा तेज हो गई है। कई मतदाता सवाल उठा रहे हैं कि यदि कोई महिला प्रत्याशी अपने विचार, योजनाएं और नेतृत्व क्षमता के आधार पर जनता के सामने नहीं आ पा रही है, तो क्या वह वास्तव में जन प्रतिनिधि की भूमिका निभा पाएगी? मतदाताओं का कहना है कि पति व अन्य रिश्तेदार के प्रभाव में चुनाव मैदान में उतरने वाली महिला प्रत्याशियों को नकार दिया जाएगा। इसके बजाए उन महिला प्रत्याशियों को मत दिया जाएगा जो अपने दृष्टिकोण व योजनाओं के साथ वोट मांगेगी भले ही वे किसी राजनीतिक संरक्षण में न हों।

ऐसा भी नहीं है कि सभी महिला प्रत्याशी अपने पति या राजनैतिक प्रभाव वाले परिवार के सहारे चुनाव लड़ रही हों। कई महिला प्रत्याशी वाकई अपने बलबूते व दूरदर्शिता के कारण पंचायती राज संस्थाओं में प्रतिनिधित्व कर अपनी अलग छाप छोड़ी है।

यह मुद्दा केवल चुनावी रणनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता को भी दर्शाता है जहां महिला को अभी भी स्वतंत्र राजनीतिक इकाई के रूप में पूरी तरह स्वीकार नहीं किया गया है।

अभी प्रश्न वहीं का वहीं है कि क्या पंचायत चुनावों में महिला प्रत्याशी वास्तव में सशक्त होकर उभर रही हैं, या फिर वे सिर्फ औपचारिक रूप से सामने हैं जबकि निर्णय लेने की शक्ति अब भी परदे के पीछे किसी और के हाथ में है?

आगामी चुनाव परिणाम भले ही जो भी हों, लेकिन यह बहस निश्चित रूप से महिला सशक्तिकरण के वास्तविक स्वरूप पर गहन चिंतन की मांग कर रही है।

घोघड़ के इस लेख के बाद चुनाव प्रचार के तरीके व महिलाओं को उनकी अपनी पहचान बनाने के लिए नई राह खुलेगी। उन पर से अनावश्यक दबाव हटेगा।


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