घोघड़, चम्बा 21 मार्च : भेड़-बकरी पालकों के लिए डिजिटल कार्ड, पशुधन बीमा, चरागाह नीति में सुधार और ऊन का ₹100 प्रति किलो समर्थन मूल्य जैसी कई घोषणाएं करते हुए मुख्य मंत्री हिमाचल प्रदेश सुखविंद्र सिंह सुक्खू ने आज बजट 2026-27 प्रस्तुत किया। उन्होंने वित्त वर्ष 2026-27 के बजट में भेड़-बकरी पालकों के हितों को ध्यान में रखते हुए कई महत्वपूर्ण घोषणाएं की हैं। सरकार ने पारंपरिक चरवाहा समुदाय के उत्थान के लिए 300 करोड़ रुपये की लागत से ‘PEHEL’ (Pastoralists Empowerment in Himalayan Ecosystems for Livelihood) योजना शुरू करने का ऐलान किया है।

प्रदेश सरकार द्वारा पेश इस बजट पर ghoghad.com ने प्रदेश के गद्दी समुदाय के भेड़ पालकों से बातचीत की तो उसमें हैरान करने वाले तर्क सामने आए। बहुत से भेड़ पालक तो इस बात से भी अनभिज्ञ थे कि प्रदेश सरकार बजट में भेड़ पालकों के हितों के लिए धन का प्राविधान भी करती है। पिछली पीढ़ी के भेड़ पालक तो अपनी व्यस्त जीवनशैली के कारण वे यह जान ही नहीं पाते कि शेष विश्व में क्या चल रहा है। इस दौरान उन्होंने अपने व्यवसाय से सम्बंधित कुछ मुद्दों पर खुलकर बात की ।

भेड़ पालक संघ के पूर्व प्रधान दलेर सिंह का कहना कि हिमाचल के भेड़-बकरी पालकों की आय भेड़-बकरी बेचने पर निर्भर करती है। कुछ वर्ष पूर्व भेड़-बकरी खरीद बिक्री के लिए शाहपुर के पास स्थित द्रम्मण नामक कस्बे में एक मंडी लगती थी जहां भरमौर क्षेत्र के भेड़ पालक निचले गर्म भागों की ओर जाते हुए अपने कुछ पशुधन की खरीद-बिक्री करते थे, उस मंडी के बंद होने के बाद भेड़ पालकों को पशुधन बेचने के लिए पर्याप्त व्यापारी नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में भेड़-बकरी पालकों को अपना पशुधन औने-पौने दाम पर बेचना पड़ रहा है। अगर वे इसे अच्छे दाम मिलने के इंतजार में बैठे रहेंगे तो घर पर उनके परिवार का भरण-पोषण करना मुश्किल हो जाएगा। उन्होंने कहा कि भेड़-बकरी के व्यापार हेतु एक पशु मंडी भी खोली जाए ताकि व्यापारियों व भेड़ पालकों को एक स्थान पर अपना व्यवसाय करने की सुविधा हो।

पिछले 70 वर्षों से भेड़-बकरी पालन के व्यवसाय से जुड़े मलकौता गांव के भेड़ पालक दिलबर सिंह बताते हैं कि एक ओर सरकार भेड़-बकरी पालन के व्यवसाय को बढ़ावा देने के लिए करोड़ों रुपए खर्च करने के दावे करती हैं जबकि धरातल पर भेड़ पालकों की संख्या साल दर साल कम होती जा रही है। अभिभावक अब अपने बच्चों को इस व्यवसाय में नहीं झोंकना चाहते। वे बताते हैं कि उनके बच्चे भले ही पढ़ लिख कर कोई नौकरी नहीं कर पाएं लेकिन भेड़ पालन के व्यवसाय में न जाएं क्योंकि समय के साथ चारागाहें सिकुड़ती जा रही हैं। एक ओर वन विभाग अपने जंगलों की बाड़ बंदी किए जा रहा है तो वहीं दूसरी ओर बची हुए भूमि पर लोग अपना मालिकाना हक जता कर पशुधन को चराने नहीं देते।
इसके अलावा भोले-भाले व निहत्थे भेड़ पालक चोरों के निशाने पर भी आ गए हैं। भेड़-बकरियों के रेवड़ को सड़क से गुजरते हुए वाहनों से होने वाली परेशानी व दुर्घटनाओं के कारण नुकसान बढ़ता जा रहा है। सरकार को इन बिंदुओं पर बी कार्य करना चाहिए।

भेड़ पालक अनिल ठाकुर बताते हैं कि समय-समय टीका करण न होने के कारण हर वर्ष कोई न कोई बीमारी भेड़-बकरी के रेवड़ों में फैलकर उनको मार रही हैं। इस वर्ष भी खुर की एक बीमारी भेड़ों में फैली है अगर समय पर इसका उपचार न हुआ तो यह अन्य रेवड़ों में फैलकर उनके लिए महामारी बन सकती है। अनिल कुमार पढ़े-लिखे भेड़ पालक हैं जो बताते हैं कि पशुधन में बीमारी की स्थिति भेड़ विकास विभाग द्वारा उपलब्ध करवाई जाने वाली दवाई की अपेक्षा निजि दुकानों की दवाइयां अधिक प्रभावशाली होती हैं। सरकार को चाहिए कि भेड़-बकरियों के लिए विभाग के माध्यम से दी जाने वाली दवाइयों की गुणवत्ता जांचकर ही आपूर्ति की जाए। भेड़ पालकों गुणवत्ताहीन दवाइयों का खर्च तो सरकार को दिख जाता है परंतु उससे भेड़पालकों को जो हानि हो रही है, वह सरकार को नहीं दिखती। उन्होंने कहा कि सरकार भले ही भेड़-बकरी पालकों की सहायता के लिए करोड़ों रुपए खर्च करने के दावे कर रही हो परंतु धरातल पर यह लाभ किसे मिल रहा है यह पता करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।

भेड़ पालक यशपाल सिंह बताते हैं कि प्रदेश में हरियाणा व राजस्थान के भेड़-बकरियों का व्यापार बढ़ रहा है जबकि हिमाचल प्रदेश की भेड़-बकरियों को खरीदने के लिए व्यापारी नहीं मिल रहे। सरकार पहले यह सुनिश्चित करना होगा कि वह प्रदेश के भेड़ पालकों के हितों की रक्षा हेतु प्रभावी कदम उठाए। यशपाल सिंह बताते हैं कि अधिकांश भेड़ पालक अपने प्रवास मार्ग व चारागाहें एक दूसरे साथ साझा करते हैं ऐसे में पशुधन का संक्रमित होने की सम्भावना बहुत अधिक होती है इसलिए पशुधन के स्वास्थ्य पर नजर रखने के लिए पशु चिकित्सकों को 10-12 दिन के अंतराल में जांच हेतु भेजा जाना चाहिए।

मलकौता गांव के भेड़ पालक रांझा राम हैं कि उन्हें बस इतना पता है कि सरकार भेड़-बकरियों के बीमार होने पर दवाइयां देती है व ऊन उतारने की मशीनें लगाती है। उन्होंने कहा कि यह दोनों कार्य समय पर नहीं किए जाते । टीका करण समय पर न होने के कारण उनकी भेड़-बकरियां बीमारी की चपेट में आ जाती हैं तो ऊन उतारने की मशीनें समय पर स्थापित न होने के कारण उन्हें कई दिनों तक इन्तजार करना पड़ता है। ऊन उतारने के स्थान के आसपास दर्जनों रेवड़ों की हजारों भेड़ बकरियों को सीमित क्षेत्र में चारे की कमी का समाना करना पड़ता है। भेड़ों से ऊन उतारने की प्रक्रिया में देरी होने के कारण उन्हें लाहौल-स्पिति के प्रवास पर निकलने में देरी हो जाती है इस दौरान जोत(दर्रे) लांघने में जोखिम बढ़ जाता है।

गौरतलब है कि इन भेड़ पालकों को अभी तक पता नहीं चला है कि बजट 2026-27 में प्रदेश सरकार ने उनके हितों के लिए क्या प्राविधान किए हैं। बहरहाल भेड़-पालक सरकार से अधिक आशा भी नहीं रखते कि वह उनके लिए कुछ करेगी। लेकिन वे इतना अवश्य चाहते हैं कि सदियों से वे जिस सादगी व सुरक्षा से अपना जीवन यापन करते आए, उन्हें करने दिया जाए।
वे कुछ कहना चाहते हैं, उनके भीतर कुछ सुलग रहा है, सरकार की योजनाओं के छींटे किसी तक पहुंचते हैं तो भीतर सुलग रहा लावा थोड़ी देर के लिए शाँत हो जाता है और छींटों के सूखने के बाद वह फिर से सुलगने लगता है । आखिर क्यों उनके भीतर के गुब्बार को समझने का दिल से प्रयास दिल से किया जाता है ताकि वे इस आधुनिक दुनिया के अपने हिस्से का जीवन नियम कानूनों, अपराधों, दुनिया के बेवजह दखल के बिना किसी परेशानी के जी सकें।
