घोघड़, भरमौर 04 मार्च : भरमौर में आज होली का त्योहार धूमधाम से मनाया गया। क्षेत्र के प्रत्येक गांव में होली खेलने के लिए युवक, युवतियों व बच्चों की टोलियां सुबह से ही उधम मचाती बाहर निकलीं। एक दूसरे को रंगों से सराबोर करते हुए यह टोलियां गांव दर गांव पहुंची।
उधर दूसरी ओर ग्राम पंचायत खणी, रुणूहकोठी व जगत में हरणातर(लोक स्वांग परम्परा का स्वरूप) निकाल कर होली मनाई गई । इस दौरान भरमौर मुख्यालय में लोगों ने होली खेलने के बाद सांयकाल घर-घर जाकर ढाढे (भुने आनाज/मेवे का प्रसाद) एकत्रित किया। लोगों ने शिवरात्रि के दौरान घर के प्रवेश द्वार पर लगाए कांटों को होली की अग्नि में स्वाहा किया।
इस दौरान जनजातीय क्षेत्र भरमौर में अलग-अलग विधि से होली त्योहार मनाने का चलन भी बढ़ता दिख रहा है या दूसरे शब्दों में कहें तो गद्दी समुदाय की होली के मौलिक स्वरूप पर दूसरी संस्कृतियों का रंग चढ़ता दिख रहा है। मुख्यालय के आसपास सरकारी कर्मचारी, पर्यटकों व अन्य बाहरी लोगों द्वारा अपनी परम्पराओं के अनुसार होली त्योहार मनाने की प्रक्रिया के कारण यहां स्थानीय होली मनाने की शैली में बदलाव आया है। मुख्यालय के आसपास के गांवों में अब दक्षिण व मध्य भारत की तरह होली मनाने का चलन बढ़ने लगा है। जबकि मुख्यालय से दूर दराज के गांवों में आज भी होली प्राचीन रीति रिवाजों के अनुसार मनाई जा रही है।
ग्राम पंचायत रणूहकोठी के निवर्तमान प्रधान शुभकरण(संजू) ने कहा कि इस घाटी में गद्दी परम्पराओं के अनुसार ही होली त्योहार मनाया जा रहा है। ग्राम पंचायत जगत व रणूहकोठी के दर्जनों गांवों के लोगों ने सामरा गांव स्थित नाग मंदिर से हरणातर टोली निकाली जो रणूहकोठी, जगत, उरैई गांवों से होती हुई वापस सामरा नाग मंदिर में पूरी हुई। उन्होंने कहा कि होली पर्व पर हरणातर टोली निकालने की परम्परा सदियों से चली आ रही है । हरणातर के कलाकारों में अब भले ही पहले जैसी वाक्पटुता न दिखती हो परंतु इस परम्परा को जीवित रखने का पूरी प्रयास किया जा रहा है।
गोसण गांव के वयोवृद्ध नानकू राम बताते हैं कि होली मनाने की प्रक्रिया प्रदूषित होती दिख रही है। युवा मर्यादित सीमा से आगे बढ़ रहे हैं, गद्दी रीति रिवाजों को भूलकर अन्य संस्कृतियों की चकाचौंध में अपने पर्व को दूषित कर रहे हैं। ढाढे के स्थान पर युवकों की टोलियां पैसे(पैसे) मांगते हैं तो हरणातर के स्थान पर डीजे बजाकर स्वयं को आधुनिक मान रहे हैं । जबकि हम गद्दियों की आधुनिकता अपनी संस्कृति, परम्परा, स्थानीय त्योहारों आदि में है। उन्होंने कहा कि अपनी परम्पराओं को बचाने के प्रयास किए जाने चाहिए अन्यथा भविष्य की गद्दी पीढ़ी व अन्य में अंतर नहीं रह जाएगा।




